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सिस्टम और लोकतंत्र

Posted On 3 May, 2017 में

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यूपी में खबर चली कि योगी राज में पेट्रोल कमतौली का सनसनीखेज खुलासा हुआ और यह भी बताया गया कि पेट्रोल पम्पों पम्पों पर डीजल पैट्रोल कमतौली का यह गोरखधंधा पिछले आठ साल से चल रहा था और इस रैकिट का कई अन्य राज्यों में जाल फैला हुआ था तो यूपी सरकार के प्रवक्ता मीडिया में बोल रहे थे कि इस कमतौली गोरखधंधे पर अखिलेश सरकार यातो अनभिज्ञ थी या फिर उसका संरक्षण प्राप्त था लेकिन लाख टके का सवाल कि अगर यूपी में अखिलेश सरकार का संरक्षण था तो एमपी राजस्थान और गुजरात में किसका संरक्षण था ? और यह पैट्रॉल पम्पों का लाइसेंस तथा इनका पूरा सिस्टम केंद्र सरकार से नियंत्रित है तो अगर आठ साल से चल रहा था तो इन आठ साल में तीन साल तो मोदी सरकार के भी हुए ,खैर यह तो राजनीति की बात हो गयी / नरेंद्र मोदी अपने हर सम्बोधन में 125 करोड़ लोगों पर निशाना साधते हैं और पूर्ण बहुमत की सरकार बताते हैं लेकिन नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी विफलता तो यही है कि तीन सालों में 125 करोड़ लोगों वाले देश को एक पूर्ण कालीन रक्षा मंत्री तक न दे सके ? इतना महत्वपूर्ण विभाग और सबसे अधिक उपेक्षित ,जनता को इससे क्या लेना देना और जनता कर भी क्या सकती है ?बात चली कि पैट्रॉल पम्पों पर कमतौली की / तो चलो मान लेते हैं कि जनता को पता चल गया है कि एक लीटर पेट्रोल की पूरी कीमत अदा करने के बाद भी 900 ml पेट्रोल मिल रहा था ,है और आगे भी मिलेगा लेकिन केवल कमतौली ही एक अकेला अपराध नहीं बल्कि मिलावट के कारण वाहनों के इंजन भी खराब हो रहे हैं /अब जनता को इस खुलासे से आखिर लाभ क्या होगा क्योंकि विकल्प जनता के पास क्या है ?यह खुलासा एक सस्ती लोकप्रियता या सनसनी फैलाकर ख़त्म हो जायेगा / हलवाई डब्बे को भी मिठाई के साथ तौलता है / दूध में पानी ही नहीं बहुत कुछ मिलाया जाता है /हिन्दुओं के त्यौहार आते ही मीडिया नकली मिठाईयों की ख़बरें हर बार एक सीरियल की तरह चलाते हैं /गोवर्धन में भगवान् पर कच्चा दूध चढ़ाया जाता है और सारा का सारा सिंथेटिक यानि जब दुस्साहस की पराकाष्ठा कि भगवान् को ही नकली दूध चढ़ा दिया तो भला इंसान की क्या औकात ? सजा आदमी को भगवान् भी जल्दी नहीं देते क्योंकि उनको भी शायद यह डर है कि अगर यह पापी जल्दी मर गया तो नरक स्वर्ग का भी माहौल बिगाड़ देगा / अस्तु !!
मिलावटी नकली कमतौली ये सब अब व्यापार के सेक्युलर अलंकार हैं लेकिन इनके पीछे मूल कारण क्या है ?सबको मालूम भी है कि कारण क्या है लेकिन अगर नेताओं का सेक्युलरिज्म या व्यापारियों का सेक्युलरिज्म कहीं स्थायी है तो वह केवल मिलावट कमतौली या नकली सामान बनाने बेचने में है /नकली , मिलावटी सामान बेचने वाले व्यापारियों को कभी भाजपा सपा बसपा लोकदल कांग्रेस में बँटते नहीं देखा होगा और अगर सेल्स टेक्स या एक्ससाइज टीम या इनकम टैक्स की टीम बाजार में आ जाय तो देखिये कि 125 करोड़ जनता को एक साथ इकट्ठे प्रेम सद्भाव और वैररहित रहने का इससे बड़ा उदाहरण कहीं और देखने को नहीं मिलेगा यानि एकता की ऐसी मिसाल कहीं देखने को न मिलेगी /
पेट्रोल पम्प या राशन सस्ते गल्ले की दूकान या केरोसिन या गैस एजेंसी क्या किसी साधारण आदमी को मिल सकती है ? गृहमंत्रालय वित्तमंत्रालय रक्षामंत्रालय बहुत चर्चित पोर्टफोलियो होते हैं लेकिन पेट्रोल डीजल सम्बंधित मंत्रालय की कोई जिक्र नहीं करता जबकि सबसे ज्यादा लाभकारी पोर्टफोलियो यही तेल मंत्रालय है /मथुरा रिफाइनरी से केवल डीजल पेट्रोल गैस और पेट्रो प्रोडक्ट ही नहीं निकलते बल्कि इन सबसे ज्यादा तो नोट निकलते हैं /इंडियन आयल कारपोरेशन के अधिकारियों से लेकर डिपो और फिर मापतोल अधिकारी ,जिला सप्लाई अधिकारी और ऊपर नीचे के सारे अधिकारी सबके बाकायदा रेट तय हैं और अब छापेमारी होगी तो निसंदेह नया रेट तय होगा जैसे वेतन आयोग की सिफारिशें तय होती हैं ठीक वैसे ही यहाँ भी समय समय पर महंगाई के हिसाब से रेट में संशोधन होता रहता है /ऐसा नहीं है कि केवल तेल मंत्री ही लाभ में रहेगा क्योंकि जिलापूर्ति मंत्रालय गृहमंत्रालय कार्मिक मंत्रालय के मंत्री भी तो बेचारे पूरे 29 दिन का उपवास रखकर एक अंतिम तारिख का इन्तजार करते हैं जहाँ जगमहाहट के साथ आँखों के चश्मे भी उतर जाते हैं /बैंक विंडो छोड़ने से पहले आदमी कई बार नोट गिनता है यहाँ तक कि वेतनभोगी और व्यापारी भी नोट गिनते हैं परन्तु रिश्वत ही एक मात्र ऐसा प्रबंधन है जहाँ नोटों की संख्या का पूरा विश्वास बना हुआ है और रिश्वत पूरी तरह सेक्युलर और धर्मनिरपेक्ष और सिस्टेमेटिक परंपरा है जहाँ कभी कभी कोई छुट्टी नहीं और कोई घालमेल नहीं और जब सत्ता बदलती है तो रिश्वत की रेट अगर स्वतः रिवाइज़ नहीं होते हैं तो सिस्टम ऐसी ईमानदारी की राह पकड़ता है कि अख़बारों मीडिया में सोशल मीडिया में भक्तों की प्रतिक्रियाएँ सुर्खियां बनने लगती हैं और इस ईमानदारी की कीमत अन्तोत्गत्वा आम आदमी यानि ग्राहक को ही देनी पड़ती है /इतिहास गवाह है कि जब जब सरकारें ईमानदार आयी है तब तब रिश्वत के रेट जल्दी जल्दी रिवाइज होने लगते हैं /हर परिवर्तन की अपनी एक कीमत है और कीमत का भुगतान बेचारा वही करता है जो इसका खरीदार है /परिवर्तन लाने के लिए टिकट भी महंगे बिकते हैं और परिवर्तन दिखने के लिए बड़ी बड़ी जनसभाएं भी करनी होती हैं और फिर 125 करोड़ लोगों को चोर बेईमान लुटेरा डिक्लेयर डिक्लेयर करने के लिए अपने आप को हरिश्चंद्र और सम्राट अशोक का वंशज साबित करना होता है /कभी कभी शिवाजी की ड्रेस पहनकर ,तो कभी महाराणा प्रताप की कॉस्ट्यूम पहनकर लालकिले से सारी दुनिया के सामने अपने को कटप्पा और पूर्वर्ती सरकार को बाहुबली भी कहना पड़ता है /इसलिए ज्यादा गंभीर न हों क्योंकि तेल मालिश करने वाले आपके ही तेल से आपकी मालिश करेंगे और फीस के तौर पर आपकी जिंदगी गिरवीं रख लेंगे वरना अगर वाकई में सरकार अपने को ईमादार कहने का साहस रखती तो मिलावट या कमतौली करने वाले और इस सिस्टम को संरक्षण देने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान करती जिसमे केवल एक कोर्ट का प्रावधान होता परन्तु यह होना नहीं है और जब गंगा की गन्दगी कोई सरकार दूर न कर सकी तो भला सिस्टम क्या शुद्ध होगा ?
Rachna rastogi

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