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तुष्टिकरण सारभौमिक सत्य

Posted On 8 Mar, 2017 में

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तुष्टिकरण सारभौमिक सत्य
तुष्टिकरण राजनीतिक परिपेक्ष में प्रयोग होने वाला एक सर्वाधिक प्रचलित शब्द और लोकप्रिय बन गया है और प्रत्येक राजनेता इस शब्द को धार्मिक ,आर्थिक ,सामाजिक और जातीय समीकरण की तराजू पर हरसंभव तरीके से अपने पक्ष में करके सत्ता प्राप्ति का सुलभ सस्ता आसान साधन मानता है लेकिन प्रश्न यह भी एक है कि यह तुष्टिकरण क्या केवल राजनीति में ही है ?धार्मिक पौराणिकग्रंथों,समाजशास्त्र,और अर्थशाश्त्र का भी अध्यन करें तो ज्ञात होता है कि समाज का हर वर्ग और प्रत्येक परिवार इस तुष्टिकरण से प्रभावित है /एक पिता तक भी अपनी सभी संतानों के प्रति एक समान प्रेम और समभाव नही रख पाता और किसी एक संतान के प्रति अधिक प्रेम और किसी के प्रति दुर्भाव ही पारिवारिक कलह और मनमुटावों का सबसे बड़ा कारण है जिसके फलस्वरूप संयुक्त परिवारों का अब एक एकल परिवारों में विघटन हो रहा है और एक ही परिवार में एक ही घर में अब कई कई चूल्हे हो रहे हैं और एक परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई और इन्ही इकाईयों से देश बनता है /पत्नी की मृत्यु के बाद यदि पुरुष दूसरा विवाह कर लेता है या एक विधवा पुनःविवाह कर लेती है तो दूसरे सम्बन्ध से उत्पन्न संतान और प्रथम सम्बन्ध से पैदा हुई संतानों के प्रति विवाहित पुरुष स्त्री का लगाव समान नही होता है जबकि इन दोनों परिस्थितियों में एक संतान तो स्वयं के डीएनए से सम्बंधित है तो यह भेदभाव क्या तुष्टिकरण नही है ?पुत्र की अभिलाषा रखकर गर्भस्थ कन्या शिशु हत्या और राजनीतिक सत्ता प्राप्ति की अभिलाषा रखकर किसी एक धर्म और संप्रदाय के विरुद्ध आक्रामक होना क्या दोनों समान नही हैं ?सदी के महानायक का अपनी संपत्ति का अपने पुत्र पुत्री में बराबर बाँटने का सोशल मीडिया में ट्वीट मीडिया की सुर्खियां बना जबकि महानायक के परिवार का प्रत्येक सदस्य अरबपति है यानि महानायक भी अपनी संपत्ति में अपनी संतानों का ही अधिकार मानते हैं जबकि महानायक को अरबपति बनाने वाले इसी भारत के 125 करोड़ हैं जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से इनकी फिल्मों के टिकट खरीदे थे परंतु समाज का आभार प्रगट करने के बजाय उन्होंने भी पारिवारिक तुष्टिकरण को प्राथमिकता वरीयता दी / पारिवारिक तुष्टिकरण के कारण ही पैदा हुए संपत्ति विवादों पर सुप्रीम कोर्ट आये दिन निर्णय देता रहता है /विवाह उपरांत अपनी कन्या को सुखी देखने की अभिलाषा प्रत्येक मातापिता की होती है और अपने दामाद के सक्षम होने के बाबजूद भी जीवन पर्यन्त अपनी कन्या के परिवार का आर्थिक बोझ वहन करना भी अपनी जिम्मेदारी मानते हैं और इसमें उनको नैसर्गिक आनंद होता है लेकिन अपने ही घर में वधु के रूप में आयी दूसरे परिवार की कन्या को नौकरानी मानकर और दहेज़ उत्पीडन करना क्या सामाजिक तुष्टिकरण नही है ? असाध्य रोग और एक अभिशाप बने इस तुष्टिकरण का बुनियाद कारण तो परिवार ही है जिसका विष समाज से राजनीति में प्रवेश कर गया है /अगर राजनीति को तुष्टिकरण मुक्त करना है तो पहले परिवारों को ही तुष्टिकरण से मुक्त होना होगा /पारिवारिक विवादों और संपत्ति बंटवारे का सबसे बड़ा कारण ही परिवार के मुखिया की तुष्टिकरण मानसिकता होना है और जब मुखिया को ही अपने परिवार के एक सदस्य को अतिप्रसन्न देखने और दूसरे हो दुःखी देखने में आनन्द होता है तो भला राजनीति कैसे तुष्टिकरण मुक्त हो सकती है ? वोटबैंक और नोटबैंक दोनों ही तुष्टिकरण से पोषित होते हैं /जो राजनेता दूसरे राजनेताओं पर धार्मिक तुष्टिकरण का आरोप लगाते हैं उनको पहले अपने परिवार को तुष्टिकरण से मुक्त करना चाहिये /नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक चली आ रही राजनीतिक विरासत क्या राजनीतिक तुष्टिकरण नही है ?क्या कांग्रेस को कोई योग्य समर्थ नेता नही मिला जिसको कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती थी ?लालू ,मुलायम शरदपंवार तो छोटे उदाहरण हैं /आजकल बैंक बचत खातों से लेकर म्युचुल फंडों और बीमा निवेश तक में नामांकन किया जाता है लेकिन निवेशक अपनी कई संतान होने और नामांकन में भी कई नामों का विकल्प होने के बाबजूद केवल किसी एक ही संतान को उत्ताधिकारी घोषित करता है तो क्या यह तुष्टिकरण नही है ?हालाँकि धन निवेशक का ही है और नामांकन का अधिकार भी निवेशक का ही है परंतु नामांकन करते समय उसके मन में तुष्टिकरण उभर जाता है और अपने पोते पोती को उत्ताधिकारी बनाने के बजाय नाती नातिनों को उत्ताधिकारी बना देता है अब यह सामाजिक न्याय है या तुष्टिकरण ?इसी प्रकार राजनेता भी चुनावी परीक्षा में अपने समर्थकों को यदि कुछ प्रलोभन देता है और सत्ता ग्रहण करने के बाद अपने वोटबैंक के प्रति पक्षपात करता है तो क्या बुरा करता है ?
रचना रस्तोगी

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