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WHY NOT BOOTHLESS POLING

Posted On 7 Dec, 2016 में

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बूथलैस चुनाव क्यों नही
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देश में पच्चीस प्रतिशत जनता एजुकेशनलैस है और चालीस प्रतिशत जनता फूडलैस और अस्सी प्रतिशत युवक जॉबलैस हैं और पचास प्रतिशत सरकारी कर्मचारी वर्थलेंस यानि अनुपयोगी हैं / देश का महानायक देश को कैशलैस सोसाइटी में परिवर्तित करने में जी जान से जुटे हुआ है और आठ नवंबर 2016 को विमुद्रीकरण के पीछे भी भारत को कैशलैस बनाना ही मुख्य धेय है जिसको सफल बनाने के लिये महानायक जनसभाओं में मोबाईल बैंकिंग पर जोर देकर कह रहे हैं कि देश के सौ करोड़ लोगों के पास मोबाइल है और चालीस करोड़ लोग स्मार्ट फोन इस्तेमाल कर रहे हैं और बैंकों से अपने मोबाइल जोड़कर लोग अपने दिनचर्या के सामान ,दवाएं ,डॉक्टर वकील की फीस ,और जरुरत की चीजें खरीद के लिए नगद भुगतान की जगह मोबाइल पेमेंट को वरीयता दें तो देश पहली जनवरी 2017 की सुबह भ्रष्टाचार मुक्त हो जायेगा और अब सरकारी विभागों के लाइसेंस शुल्क और सभी प्रकारों के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष टैक्स भी ऑनलाइन अथवा मोबाइल बैंकिंग से जमा करने की योजना पर बहुत तेजी से काम हो रहा है और पांच हजार से अधिक का लेबर ठेकेदार भुगतान अब ऑनलाइन ही होगा / देश का महानायक जब देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिये पचास दिन का समय मांग रहा है तो देशवासियों का भी अपने महानायक के प्रति कुछ कर्तव्य बनता है और देशवासियों को महानायक से यह अपील करना बनता है कि जब पारदर्शी एवं भ्रष्टाचारमुक्त व्यवस्था के जब सब कुछ ऑनलाइन जरुरी है तो महानायक देश में नगरपालिका जिलापंचायत विधायकी और सांसदी चुनाव व्यवस्था को ऑनलाइन क्यों नही बनाते ? इन चुनावों में अरबों सफ़ेद रूपया भारत सरकार का और अरबों रूपया कालाधन उम्मीदवारों का खर्च हो जाता है और इतने बड़े पैमाने पर पैसे की बर्बादी के बाद भी देश शिक्षालेस फूडलेस जॉबलेस और वर्थलैस है तो फिर हासिल क्या हुआ ?चुनाव आयोग मोबाइल पर आधारकार्ड लिंक करके एक एप डाऊनलोड करवाकर मोबाइल वोटिंग करवा सकता है और इससे घर बैठे बैठे ही मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट दे सकेगा और चुनाव आयोग को न बूथ की जरूरत और नाहीं अर्धसैनिक बलों की जरूरत पड़ेगी /कोई बूथ केप्चरिंग का झगड़ा नही और मात्र एक दिन में पूरे देश में चुनाव संभव तथा शाम को परिणाम भी घोषित और अगले दिन किसी और महानायक का राजतिलक ? भारत में प्रतिदिन कुछ सड़क छाप कुत्ते कड़ाके की ठण्ड में ठिठुरकर या भयंकर गर्मी में लू खाकर मर जाते है तो कुछ गाड़ियों से कुचलकर लेकिन कुछ कुत्ते इतने खुशनसीब होते हैं कि गर्मियों में वातानुकूलित कमरों में रहते हैं और गाड़ियों में बैठकर सैर सपाटा भी करते हैं /इसी भारत में कुछ आदमियों के पास खाने की एक रोटी भी नही तो कुछ कुत्ते महंगे बिस्कुट भी खाते हैं /लेकिन कभी किसी सड़क छाप कुत्ते ने यह नही कहा कि कारों में घूमने वाले कुत्तों ने सड़क छाप कुत्तों का हक़ छीन रखा है और जो बिस्कुट अमीर कुत्ते खा रहे हैं उनपर पहला हक़ गरीब कुत्तों का है / नियति भारत की यही है कि सत्तर साल का रोना रोने के तीस महीने बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है / यही भारत की सबसे बड़ी त्रासदी है कि गरीबी का भयंकर मजाक उड़ाकर छोटे लालच देकर बेरोजागर नवयुवकों को अमीरों के प्रति भडकाया जाता है और भीड़ का महानायक वहां बैठे बेरोजगारों भूखों और लाचारों को अपना हाईकमाण्ड कहता है लेकिन संसद में पहुँचते ही वह 125 करोड़ लोगों का हाई कमाण्ड बन जाता है /अगर महानायक के भाषणों से उत्तेजित होकर तथाकथित गरीब तथाकथित अमीरों के घरों में लूटपाट शुरू करदें तो अराजकता फैलने में देर भी लगेगी और ऐसा होना कोई मुश्किल भी नही है क्योंकि भारत भावनात्मक देश है जहाँ लोग एक नेता के लिए आत्मदाह तक कर लेते हैं और उकसावे पर रेल की पटरियां भी उखाड़ देते हैं बसों में आग तक लगा देते हैं क्योंकि भारत में नेता का आदेश भगवान् का आदेश समान माना जाता है / एक ओर महानायक कहता है कि भारत का एक भी व्यक्ति असामयिक मृत्यु मरता है तो उसको दुःख होता है लेकिन 105 गरीब भारतीय इसी महानायक की जिद के कारण बैंकों के बाहर खड़े खड़े मर गये लेकिन कोई संवेदना नही जबकि इन्ही गरीबों की वोट से बना एक नेता मर जाय तो पूरे देश में राष्ट्रीय शोक बनता है,भले ही वह नेता जीवन में बलात्कार ,हत्या, अपहरण, आय से अधिक संपत्ति या भ्रष्टाचार के किसी मसले में जेल तक गया हो / रेल दुर्घटना में 150 लोग मर जाएँ तो मुआवजे में पुरानी करेंसी देकर पिंड छुड़ाया जाता है और ट्वीट से शोकसंदेश भी / महानायक गंगा के बुलावे पर बनारस गये लेकिन तीस महीने बाद गंगा आज भी गन्दी और लेट लतीफी का आलम यह कि ई गवर्नेंस में कोई ट्रेन राईट टाइम नही और अर्थव्यस्था चौपट हो चली / प्रत्येक दिन एक नये विवाद का जन्म और लोकतंत्र की रात लंबी और काली होती जा रही है और सूर्योदय कब होगा पता नही ?अचम्भा देखिये कि इसी वर्ष के 30 सितंबर 2016 को कुल डेढ़ लाख सालाना का आयकर रिटर्न दाखिल करने वाला 13860 करोड़ रूपया की रकम घोषित करता है और मीडिया के सामने बखूबी कबूलता भी है कि रकम उसकी नही बल्कि गरीबों की वोटों से बने कुछ नायकों और नायकों के बफादार कुछ अधिकारियों की है लेकिन जाँच एजेंसियों को उन नायकों के नाम पता नही ?अचानक कुछ आदमियों के खातों में करोड़ों रुपये पहुँच जाते हैं लेकिन शोर मचते ही बैंकों की गलती प्रगट होती है लेकिन अगले दिन खातेदार गायब हो जाता है /महानायक भीड़ में कहते हैं कि उनके दिमाग में बहुत से नए नए विचार आते हैं और तुरंत निर्णय लेते हैं और महानायक के चेले कहते हैं कि पीछे हटना महानायक के स्वाभाव में नही क्योंकि महानायक गरीबी में पले बड़े हैं और महानायक किसी की सुनते भी नही लेकिन महानायक तानाशाह भी नही / महानायक कहते हैं कि सत्तर सालों के पाप धोने हैं जिनमे ढाई साल उनके शामिल हैं या नही ,इसमें संशय है लेकिन महानायक कहते हैं कि दूध दाल रोटी ब्रेड दवाई और रोजमर्रा के सामान की खरीद ई पैमेंट से करें तो भाई !!! जब सत्तर सालों के पाप ही धोने हैं तो माननीयों का चयन भी मोबाईल आधार कार्ड वोटिंग से क्यों नही ?क्या महानायक देश को पाप भ्रष्टाचार और चुनावलैस बनाने के चुनाव आयोग को मोबाइल आधार कार्ड वोटिंग के लिए बाध्य नही कर सकते इससे चुनावों में खर्च होने वाले अरबों खरबों रुपियों की बचत भी होगी और चुनाव आयोग को भी अब नायकों की रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाकर ई भाषणों को ही मान्य करना होगा ,क्योंकि मोबाइल पर जब महानायक सहित अन्य नायकों के मोबाइल एप तैयार हैं तो जनसभा की कोई जरुरत नही /एक रैली में लाखों रूपया का डीजल पेट्रोल खर्च हो जाता है और महानायकों नायकों के हेलीकॉप्टरों एवं सुरक्षा खर्च अलग से यानि एक रैली भारत की अर्थव्यवस्था को करोड़ों की चपत लगाती है और यह पैसा देश का है किसी नायक अथवा महानायक का व्यक्तिगत धन नही और इसके बाबजूद भी अगर कोई नेता ई भाषण की जगह रैलियों द्वारा संबोधित करता पकड़ा जाय तो इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ मानकर उनको सदा के लिए माननीय बनने से वंचित किया जाय तो वाकई में सत्तर सालों के कुछ तो पाप धुलेंगे ? इलेक्ट्रॉनिक युग में थ्री डी तकनीक से भी नेतागण अपने समर्थकों को संबोधित कर सकते हैं और अब तो भारत का प्रत्येक गावँ में टीवी का डिजिटल प्रसारण हो रहा है तो नायक एवं महानायक टीवी के माध्यम से अपना भाषण अपने समर्थकों तक पहुंचा सकते हैं जिससे न केवल समय की बर्बादी रुकेगी बल्कि देश की अर्थव्यस्था मजबूत होगी /अगर वास्तव में देश की गरीबी दूर करनी है तो देश को माननीयमुक्त बनाना भी एक विकल्प है क्योंकि भले ही माननीय अपने को जनता का सेवक कहें लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक चोट ये माननीय ही पहुंचा रहे हैं /दक्षिण भारत के एक मुख्यमंत्री के निधन पर दिल्ली से कई माननीय अलग अलग हवाई जहाजों से गये कुछ के लिए विशेष विमान भी थे तो क्या सारे माननीय एक ही विमान से श्रद्धांजलि देने नही जा सकते थे /सवाल यही उठता है कि आखिर सारे दंड का भागी भारत एक आम गरीब फूडलैस जॉबलेस और कैशलैस आदमी ही क्यों ?
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