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धंधा कमीशन का

Posted On 1 Jul, 2016 में

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धंधा कमीशन का
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अाज के नेता विश्व बैंक और विदेशी सरकारों से भीख मांगने को विकास का मानक कहते हैं लेकिन श्रीमती इंदिरा गांधी स्वदेशी निवेश पर् ध्यान देती थीं और इसके पीछे कारण भी है कि इंदिरा गांधी ने गुलामी से अाजादी तक का सफर अपनी नंगी अांखों से देखा और अपने कानों से सुना तथा अपने हाथों से स्पर्श किया हुअा था / इंदिरा जैसा सशक्त और द्रढ निश्चयई नेता अब भारत को मिलना असंभव है /अापातकाल को लेकर इंदिरा गांधी को कोसा जाता है लेकिन यही अापातकाल कुछ अराजक नेताओं के लिये अभिशाप होगा लेकिन भारतीय जनमानस के लिये तो यह ईश्वर का एक अनोखा उपहार था क्योंकि इन ढाई सालों मे भारतीय अर्थव्यवस्था भी सुधरी थी तथा न्यायिक सामाजिक कार्यपालिका यातायात रेलवे बैंकिंग भी सीधे रास्ते पर् गए थे / दोष् हर व्यक्ति मे होता है तो इंदिरा गांधी भी एक इंसान ही तो थीं लेकिन फिर भी इंदिरा गांधी के समय काल मे देश का सर्वांगीण विकास हुअा था /इंदिरा गांधी के केरियर मे अमृतसर स्वर्णमंदिर कांड एक जरूर दाग है लेकिन अगर भारत के विकास का खाका चींचते हैं तो वृक्षारोपण ,बांध निर्माण ,विश्विद्यालय निर्माण ,प्राथमिक शिक्षा ,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ,परिवार नियोजन ,पशुधनविकास जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम इन्ही इंदिरा गांधी के समय मे फलीभूत हुए क्योंकि इंदिरा गांधी इनका महत्व समझती थीं और पोस्टल लघुबचत योजना तो इंदिरा गांधी का सबसे अधिक प्रिय विषय था क्योंकि इंदिरा जी ने गुलामी का समय देखा था और इंदिरा जानती थी कि लघुबचत सबसे अधिक उपयोगी ही नही बल्कि देश के लिए भी परमावश्यक निधि है /रोजगार समस्या तो 1947 मे भी थी और अाज 2016 मे भी है लेकिन रोजगार के अवसर खोजने का काम राष्ट्रीय नेताओं का है और देश के विकास के लिये पैसे की भी जरूरत है तो इंदिरा गांधी ने इन दोनों समस्यों का समाधान पोस्टल लघुबचत योजना से निकालने का भरसक प्रयास किया / लघुबचत निवेश योजना को स्कूली स्तर से संचायिका प्रणाली के माध्यम से शुरू करके पोस्टल लघुबचत स्कीमों तक पहुंचाया यानि स्कूली बच्चों तक को संचायिका प्रणाली से प्रेरित किया और इंदिरा कहती थी कि अाज की बचत कल की अाय होगी / पोस्टल लघुबचत योजनाओं को सफल बनाने के लिए एजेंट व्यवस्था रखी गयी ताकि ग्रामीण और शहरी दोनों वर्ग लघुबचत योजनाओं मे धन निवेश कराने पर् कुछ कमीशन पा सकें और यह एजेंट व्यवस्था एक वैकल्पिक स्वरोजगार भी थी और अाय का साधन भी और केंद्र सरकार ही एजेंटों को उनके कराए गए निवेश पर् कमीशन देती थी यहाँ तक कि लघुबचत का एक मंत्रालय तक बनाया गया और हर जिले मे एक कार्यालय भी खोला गया और भारत के जिस जिले मे सर्वाधिक लघुबचत निवेश होता था उस जिले के जिलाधिकारी और लघुबचत निदेश को प्रशस्ती पत्र भी दिया जाता था और सर्वाधिक निवेश कराने वाला एजेंट भी पुरुस्कार पाता था /एजेंट भी निवेश बढाने के लिए निवेशकों को अपने कमीशन का साझीदार बनाया करते थे और पोस्टमास्टर एजेंटों की मदद किया करते थे लेकिन अब स्थिति यह हो गयी है कि सरकार स्वदेशी निवेश को हतोत्साहित करती है और पोस्टमास्टर ही एजेंटों का जमकर शोषण करते हैं यानि जो योजना स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए बनाई गयी थी अब स्वरोजगारों का शोषण करने लगी / प्रोविडेंट फंड स्कीम मे एजेंट कमीशन बंद किया जा चुका और एनएससी केवीपी टीडी मे कमीशन निवेश का 0.05 है यही एक लाख रुपए के निवेश पर् एजेंट को पांच सौ रुपया मिलता है जिसमे पचास रुपया टीडीएस के नाम पर कट जाता है और शेष बचे साढ़े चारसौ रुपयों मे से चार सौ रुपया तो पोस्टमास्टर ही झटक लेता है यानि अब एजेंट निवेशक को भी कुछ हिस्सा नही दे पाते और बेरोजगारी से पहले से मारे हुए एजेंट कागजों मे तो पाँच सौ रुपया पाते हैं लेकिन हकीकत मे केवल पचास रुपया ही घर लेकर जाते हैं /सरकार चूंकि पोस्टल निवेश को हतोत्साहित कर रही है इसलिए पुराने एजेंट शोषण को तैयार नही और भुखमरी बेरोजगारी से परेशान युवक इस शोषण के सबूत के तौर पर् हर पोस्ट अाफिस मे चपरासी की तरह काम करते दिख जाएंगे /केंद्र सरकार अधीन पोस्टल विभाग मे पोस्ट मास्टर और बाबुओं को छठे वेतन अायोग के अाधार पर् साठ हजार से लेकर एक लाख रुपया तक मासिक वेतन मिलता है लेकिन उसके बाबजूद इनके पेट् मगरमच्छ जैसे होते जा रहे हैं जो हर समय भूखे रहते हैं / एक सर्वे के अनुसार हर पोस्ट अाफिस मे लगभग दो से तीन लाख रुपया प्रतिदिन निवेश होता है यानी पोस्टमास्टर रोजाना ही हजार दो हजार रुपया रोज कालाधन अपने घर लेकर जाता है जिसके नाम पर् कमीशन मिला उस बेचारे को पूरे दिन मे बामुश्किल सौ रुपया और धन देने वाले निवेशक को कोई इंसेंटिव नही लेकिन मौज अायी पोस्टमास्टर की ?कौशल विकास और स्वरोजगार इस भ्रष्ट सिस्टम मे अब कैसे संभव है /सरकार रोजगार नही दे सकती तो कम से कम शोषण तो बंद करवा ही सकती है /एक लाख रुपए के निवेश पार् पांच सौ रुपए कमीशन मे पचास रुपया तो सरकार ने ही टीडीएस के नाम पर् वसूल लिए और शेष साढे चार सौ रुपए मे चार सौ रुपया पोस्टमास्टर गटक गया और एजेंट बेचारा पचास रुपया कमाकर पांच सौ रुपए के लिए सरकार और निवेशकों की निगाह मे बदनाम हुअा / कहने को तो पीएम और डाक एवं दूरसंचार मंत्री कहते हैं कि भ्रष्टाचार समाप्त हो चुका है लेकिन यह तो एक छोटे से डाकखाने का भ्रष्टाचार है तो पूरे भारत मे कितना होगा ?
रचना रस्तोगी

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gump के द्वारा
July 20, 2016

Es monstruoso que un sindicato de clase distinga entre trabajadores de aquí o de allá. Todos los trabajadores tienen los mismos derechos. ¿No es así, compañeros de UGT? &#rba;T1a91jadores del Mundo, uniros?

Rinki Raut के द्वारा
July 3, 2016

रचना जी, कमीशन का धंधा बहुत पुराना है,मुनाफेखोरी की लत अधिकतर सरकारी मुलाजिम का मर्ज है


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