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बटाई या आउटसोर्सिंग

Posted On 8 Jun, 2016 में

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बटाई या आउटसोर्सिंग
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सेना ,पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों में अधिकांश कर्मचारी किसान पृष्ठभूमि से हैं और अपने परंपरागत कृषि व्यवसाय से मोह रखते हैं इसलिए अपने खेतों को बटाई पर दे देते हैं और पहले किसान स्वयं अपने खेत में हल चलाया करते थे और खाद पानी दिया करते थे लेकिन अब चूंकि परिवार छोटे होते जा रहे हैं तो किसानों यातो अपने खेत बटाई पर दे देते हैं याफिर ठेके पर /इसी तर्ज पर अमेरिका की सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ भी भारतीय आईटी कंपनियों से बटाई अथवा आउटसोर्सिंग से काम कराती हैं यानि शुद्ध भाषा में यह ठेकेदारी प्रथा चलन में है / यूपी में नगरनिगम और बिजली निगम भी इसी आउटसोर्सिंग को अपना रहे हैं /नाली नालों की सफाई आउटसोर्सिंग माध्यम से कराने पर निगम पर बारों महीनों की तनख्वाह का बोझ कम हुआ और ठेकेदार से भी रिश्वत मिल जाती है और ठेकेदार भी मजदूरों से भली भांति काम लेने में सफल हो जाता है क्योंकि यही कर्मचारी नौकरी मिलते ही यूनियनबाजी में लग जाते हैं /बिजली विभाग में लाइनमेन का काम भी इसी ठेकेदारी सिस्टम पर चल रहा है और भारत सरकार का टेलीफोन विभाग भी अब यही राह पकड़ चूका है यानि अब टेलीफोन शिकायत से लेकर टेलीफोन ठीक करने का जिम्मा आउटसोर्सिंग पर निर्भर /शीघ्र ही पोस्टमेन सर्विस भी आउटसोर्सिंग की भेंट चढ़ेगी /सरकार का पैसा तो जरूर बचा क्योंकि वेतन और महंगाई भत्ते से लेकर अन्य भत्तों की देनदारी ख़त्म हुई लेकिन उपभोगताओं की मुसीबत खड़ी हो गई क्योंकि विभागीय जबाबदेही ख़त्म हो गई और ठेके पर काम करने वाले संविदा कर्मी बिना रिश्वत लिए कोई काम करते नहीं / स्थिति यहाँ तक है कि डिग्री कॉलिजों तक में टीचिंग संविदा यानि आउटसोर्सिंग से हो रही है और सरकार का दावा कि भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया ?बेरोजगारी का यह सबसे घिनोना स्वरुप है क्योंकि कई एमए पास लोग नाली नालों की सफाई ठेकेदरों के संरक्षण में कर रहे हैं क्योंकि सरकारी नौकरी में आरक्षण व्यवस्था से उनको नौकरी मिलने वाली नहीं है और ठेकेदार भी पैसा उनको समय पर नहीं देता है इसलिए बेचारे सडकों किनारे दुकानदारों और व्यापारियों के प्रतिष्ठान के आगे कूड़ा न फ़ैलाने के एवज में दो चार सौ रूपया ऐंठ लेते हैं और बरसात आदि से पहले ही नगरनिगम को नाली नालों की सफाई याद आती है तो इन बेरोजगारों को थोड़ा सा काम मिल जाता है / बिजली विभाग भी सविदा पर रखे लाइनमेनों को वेतन नहीं देता है बल्कि उनको पब्लिक से वसूलने के खुला छोड़ रखा है और बिजली फाल्ट होने पर ये भी उपभोगताओं का जमकर शोषण करते हैं यही उनका वेतन लेना का तरीका बन चूका है / और अब टेलीफोन विभाग में शिकायत 198 नंबर पर दर्ज होने पर सम्बधित एसडीओ भी आउटसोर्सिंग से कम्प्लेंट ठीक करवाता है अगर उपभोगता ने लाइनमेन को घूस नहीं दी तो फाल्ट एक्सचेंज के भीतर बताकर लाइनमेन चलता हो जायेगा और फिर चक्कर लगाते रहिये ,कौन सुनता है ?पोस्टमैनों की भी नई भर्तियां नहीं हो रहीं हैं यहाँ भी आउटसोर्सिंग यानि अगर आपने क्षेत्रीय पोस्टमेन को खुश नहीं रखा तो डाक घर अथवा दुकान पर नहीं आएगी ,चिल्लाते रहिये कौन सुनता है ?स्वास्थय विभाग भी अब आउटसोर्सिंग अपना रहा है यानि नए डाक्टर भर्ती करने के बजाय ठेके पर डाक्टर रख लेते हैं जिससे हर साल का वेतन वृद्धि का झंझट भी ख़त्म और डाक्टर को ठेका देने के एवज में कुछ कमाई भी हो जाती है और इन ठेके पर रखे डाक्टरों को प्राइवेट प्रेक्टिस भी अनुमन्य है, सरकारी असपतालों से लेकर सरकारी मेडिकल कॉलिजों में यही आउटसोर्सिंग पद्धति चल रही है और मरीज बेचारे दम तोड़ते हैं जिसपर न मानवाधिकार आयोग को तरस आता है और न सुप्रीम कोर्ट ही संज्ञान लेता है / अगर आउटसोर्सिंग ही बढ़िया माध्यम है तो राष्ट्रपति महोदय को भी लोकसभा और विधान सभा में सांसद विधायक का काम आउटसोर्सिंग से ही करवाना बेहतर विकल्प होगा इससे सरकार भी पारदर्शी रहेगी और सांसदों विधायकों के भारी भरकम खर्चे भी बंद / सोचिये सोचिये और फिर सोचिये और राष्ट्रपति महोदय को आउटसोर्सिंग प्रणाली पर विचार करने को बाध्य करिये !!
रचना रस्तोगी

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