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कैलंडर वर्ष 2016 का आगमन

Posted On: 28 Dec, 2015 Others में

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कैलंडर वर्ष 2016 का आगमन
जिंदगी एक ऐसी परीक्षा है जहाँ हर पल तैयार रहना पडता है ।समस्याओं से क्या डरना क्योंकि हर समस्या स्वयं ही एक समाधान साथ लेकर चलती है ।बुद्धिमानी इसी में है कि समस्या के साथ आये समाधान को देखने खोजने की कोशिश करें ।धैर्य संयम इस समस्या को हल करने की कलम हैं जिनको बखूबी इस्तेमाल करने की कला खोजनी होती है । यह कला खुद खोजनी है और ईश्वर पारायण व्यक्ति की मदद स्वयं ईश्वर करते हैं ; समस्या को दूर करने में नहीं बल्कि समस्या को हल करने में करते हैं क्योंकि धैर्य संयम और विवेक ईश्वर कृपा से ही मिलता है ।बीतने वाला हर पल एक अनुभव छोडकर जाता है और यही अनुभव आगामी समस्या को हल करने में सहायक होता है । ईश्वर साकार है या निराकार, सगुण है या निर्गुण, राम कृष्ण अवतार हैं या स्वयं अवतारी, इन निरर्थक विवादों में नहीं पडना है । ईश्वर है जो हर समय हमारे साथ है, हमारे भीतर भी है और बाहर भी और हम स्वयं ईश्वर में बसे रमे हैं तो चिंता किस बात की ? समय भाग रहा है जिसे हम रोक नहीं सकते और समय के साथ हम भाग भी नहीं सकते तो विकल्प क्या है? एक मात्र उपाय या विकल्प यही है कि जैसा जो जिस स्थिति परिस्थिति दिशा दशा में है उसे वैसा ही स्वीकार कर लो तो कोई ग्लानि ईष्या द्वेष राग अहंकार न बचेगा और जो बचेगा वह शांति होगी और यही शांति हमारे चित्त को परम सत्ता के साथ समन्वय में सहायक होगी । प्रत्येक दिन हमें सतयुग त्रेता द्वापर और कलियुग का साक्षात्कार होता है; ब्रहम बेला सतयुग, दोपहर त्रेता शाम द्वापर और रात कलियुग ही तो है।सतयुग मे जलंधर को विष्णु ने मारा और त्रेता में रावण को राम ने मारा लेकिन द्वापर में कंस बनकर आ गया और ये सब जय के अवतार बताये गये तो सोचो मरा कौन ? यह सब चलता रहता है, कभी लीला तो कभी कथा बन जाती है लेकिन प्रकृति सत्य को स्वीकार करती है ।जो हो रहा है वह होकर रहेगा तो खामखाह झंझट क्यों मोल लेना ।कैलंडर वर्ष 2015 समाप्त हो रहा है और कैलंडर वर्ष 2016 शुरू होने वाला है लेकिन सप्ताह के केवल सात ही दिन हैं जो नियमित रूप से क्रमबद्ध बदलते रहेगें चाहे कोई वर्ष हो या कोई भी युग हो ।हर बीता हुआ पल नये वर्ष नये युग नये कल्प की नींव रखता चलता है ।हमारा लक्ष्य आखिर क्या है? और हमारी क्या उपलब्धि है ? और लक्ष्य प्राप्ति में अभी कितनी दूरी बची हुई है यह विचार करना होगा।कोई क्या कहेगा, यह नहीं सोचना है और यह हमसे नहीं होगा यह भी नहीं सोचना है? हमें अपने मार्ग पर तेजी से बढना है और यही संघर्ष साधना है ।हमें जो कुछ यहाँ मिलता है वह प्रकृति की अनुपम कृपा और भेंट हैं इसलिए हमारा दायित्व भी बनता है कि हम प्रकृति के नैसर्गिक न्याय और क्रिया का उलग्घन न करें / भगवान हमें स्वच्छ जल पीने को देते हैं ,शुद्द वायु स्वांस लेने हेतु देते हैं और पृथ्वी के गर्भ से अन्न पैदा होता है ,सूर्य हमें प्रकाश एवं ऊर्जा प्रदान करते हैं तो चन्द्रमा वनस्पति की रक्षा करते हैं ,नदियां जल कला स्त्रोत्र हैं और हिमालय पर्वत जलवायु नियंत्रित करते हैं यानि भगवान हमारी हर आवश्यकता की पूर्ति करते हैं और हम प्रकृति का दोहन और प्रदूषण फैलाने को ही आधुनिकता एवं विकास मान बैठे हैं / यही विकृत सोच समाज और विश्व में अशांति की स्थापना करती है / हमें भगवान का ऋण अदा करना ही होगा इसलिए हमें प्रकृति और जलवायु के साथ घिनोनी छेड़छाड़ बंद करनी होगी / साफ़ सफाई करना या वातावरण स्वच्छ रखना हमारा नैसर्गिक उत्तरदायित्व भी है और सामाजिक जिम्मेदारी भी है / विचार प्रदूषण सबसे खतरनाक है और विचार प्रदूषण ही विश्व को परमाणु युद्ध की ओर धकेल रहा है / परमाणु शक्तियां कभी कभी भी उद्वेलित होकर भयंकर विनाशलीला रच सकती हैं क्योंकि लोकतान्त्रिक देशों में अब सत्ता गलत हाथों में जा रही है जिसका दुरुपयोग निजी स्वार्थपूर्ति में हो रहा है / लोकतंत्र अब मर्यादा एवं सामाजिक संतुलन के लिए खतरा बनता जा रहा है और विश्व शांति स्थापना के लिए सभी को प्रकृति का सम्मान करना ही होगा / वैज्ञानिक आनुवंशिक विकास यात्रा को मनुष्य की मस्तिष्क क्षमता और कुछ अंगों के विलुप्तीकरण से समझाने का प्रयास करते हैं और आदिमानव से आधुनिक मानव विकास यात्रा केवल मस्तिष्क केपेसिटी और क्षमता पर आधारित है / लेकिन कोई वैज्ञानिक आज तक यह नही समझा पाया कि करोड़ों अरबों वर्षों के अनुवांशिक विकास यात्रा को झेलते झेलते भी मनुष्य की आंतें कई मीटर लम्बी क्यों हैं ? मांसाहारी जीवों की आंतें छोटी और शाकाहारी जीवों की आंतें लंबी होती हैं / अब यह प्रश्न फिर उठ खड़ा हुआ कि मनुष्य की आंतें इतनी लंबी क्यों हैं क्योंकि मनुष्य नैसर्गिक शाकाहारी जीव है लेकिन जानबूझकर मांसाहारी बनने की कोशिश करके राक्षसी प्रवृति को बढ़ा रहा है/ अतः प्रकृति का सम्मान करते हुए नैसर्गिक शाकाहारी जीवन शैली को ही धारण करें और धैर्यता से इसी सोच के साथ वर्ष 2016 का स्वागत करें ।
रचना रस्तोगी

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